पटना 7 जुलाई 2026

पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय ने कांग्रेस सांसद व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आगामी 15 जुलाई के पटना दौरे पर तीखा हमला बोला है। श्री पांडेय ने कहा कि राहुल गांधी का यह प्रस्तावित छात्र सम्मेलन युवाओं के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि देश और बिहार की जनता को गुमराह करने और अपनी नकारात्मक राजनीति को चमकाने का एक असफल प्रयास है। देश की जनता भली-भांति जानती है कि राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने हमेशा एक ;;नकारात्मक विपक्ष’’ की भूमिका निभाई है। बिहार की जागरूक जनता और यहां के युवा उनके इस बहकावे में आने वाले नहीं हैं।

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श्री पांडेय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार युवाओं के रोजगार, शिक्षा और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मोदी सरकार की इस पारदर्शी पहल के तहत अब तक देश के लाखों युवाओं को सीधे सरकारी विभागों में नियुक्ति पत्र सौंपे जा चुके हैं। बजट में घोषित विकसित भारत रोजगार योजना के जरिए अगले दो वर्षों में 3.5 करोड़ से अधिक नए रोजगार पैदा करने का लक्ष्य है। देश की टॉप कंपनियों में 1 करोड़ युवाओं को पेड इंटर्नशिप दी जा रही है, जिसमें 9,000 प्रति माह स्टाइपेंड का प्रावधान है। कांग्रेस के छात्र सम्मेलन पर तंज कसते हुए श्री पांडेय ने कहा कि जिस पार्टी का बिहार में संगठन पूरी तरह ’’शून्य’’ हो चुका है और जिसके पास जनता के लिए कोई नीति या एजेंडा नहीं है, वह आज युवाओं की बात कर रही है। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में विजन (दूरदर्शिता) की भारी कमी है। बिना किसी ठोस धरातल और बिना किसी सकारात्मक रोडमैप के, केवल खोखली बयानबाजी के दम पर कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश हास्यास्पद है। कांग्रेस ने हमेशा युवाओं को केवल एक ’’वोट बैंक’’ के रूप में इस्तेमाल किया है।

श्री पांडेय ने राहुल गांधी को आड़े हाथों लेते हुए याद दिलाया कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी बिहार की जनता ने उनके खोखले दावों को सिरे से खारिज करते हुए कांग्रेस को करारी शिकस्त दी थी। चुनाव दर चुनाव मिल रही हार यह साबित करती है कि बिहार के लोगों का कांग्रेस की नीतियों से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में युवाओं के लिए कोई ठोस रोजगार नीति नहीं थी, जिससे देश का युवा वर्षों तक बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर रहा। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता की भारी कमी थी।

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