पटना, 15 सितम्बर 2026।
बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ (कॉफ्फेड) ने बिहार सरकार द्वारा नवादा जिले के सात जलाशयों की मत्स्य बंदोबस्ती खुली डाक/खुली निविदा के माध्यम से किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की है। कॉफ्फेड का कहना है कि यह निर्णय बिहार मत्स्य जलकर प्रबंधन अधिनियम, 2006 तथा उसके बाद किए गए संशोधनों की मूल भावना, पारंपरिक मछुआरों की आजीविका और प्रखंडस्तरीय मत्स्यजीवी सहयोग समितियों के वैधानिक अधिकारों के प्रतिकूल है।

कॉफ्फेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने कहा कि बिहार मत्स्य जलकर प्रबंधन अधिनियम, 2006 का उद्देश्य केवल सरकारी राजस्व प्राप्त करना नहीं, बल्कि राज्य के पारंपरिक मछुआरों को उनकी सहयोग समितियों के माध्यम से जलकर उपलब्ध कराना, वैज्ञानिक मत्स्य उत्पादन बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित करना है। वर्ष 2018 के संशोधन की प्रस्तावना में भी जलकरों की बंदोबस्ती मत्स्यजीवी सहयोग समितियों के साथ करने की राज्य की नीति को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है।
उन्होंने कहा कि मत्स्यजीवी सहयोग समितियां सामान्य व्यावसायिक ठेकेदार नहीं हैं। ये कानून द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसी आजीविका संस्थाएं हैं, जिनके माध्यम से जलकरों का लाभ वास्तविक एवं पारंपरिक मछुआरों तक पहुंचाया जाता है। जलाशयों को निजी ठेकेदारों अथवा बाहरी व्यावसायिक संस्थाओं के लिए खुली नीलामी में रखने से स्थानीय मछुआरों के रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और परंपरागत मत्स्य अधिकारों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

खुली डाक से पहले सरकार सार्वजनिक करे वैधानिक आधार- कॉफ्फेड ने राज्य सरकार से पूछा है कि नवादा जिले के सात जलाशयों की खुली डाक अधिनियम की किस धारा के अंतर्गत निकाली गई है।
’’कार्यपालिका की नीति विधानसभा द्वारा पारित कानून से ऊपर नहीं’’ कॉफ्फेड ने जलाशय मात्स्यिकी नीति, 2022 की वैधानिक स्थिति पर भी प्रश्न उठाया है। संगठन ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को प्रशासनिक नीतियां बनाने का अधिकार है, लेकिन कोई विभागीय नीति, संकल्प, परिपत्र अथवा निविदा की शर्त विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियम को संशोधित, कमजोर अथवा निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
यदि जलाशय मात्स्यिकी नीति, 2022 के आधार पर मत्स्यजीवी सहयोग समितियों की वैधानिक भूमिका समाप्त की जा रही है, पात्रता एवं बंदोबस्ती प्रक्रिया बदली जा रही है अथवा निजी संस्थाओं के लिए अप्रतिबंधित खुली नीलामी प्रारंभ की जा रही है, तो ऐसे प्रावधान बिहार मत्स्य जलकर प्रबंधन अधिनियम, 2006 के विपरीत और न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
श्री कश्यप ने कहा कि “हम पारदर्शिता अथवा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के विरोधी नहीं हैं। हम कानून की अवहेलना और पारंपरिक मछुआरों के वैधानिक अधिकारों को समाप्त करने वाली व्यवस्था के विरोधी हैं। विभागीय नीति को विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम से ऊपर नहीं रखा जा सकता।”
’’पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर’’
नवादा जिले के सात जलाशयों की खुली डाक प्रक्रिया के विरुद्ध कॉफ्फेड के प्रबंध निदेशक द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की गई है। इसके अतिरिक्त माननीय मुख्यमंत्री, बिहार सरकार तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को भी पत्र भेजकर मामले में हस्तक्षेप करने और खुली डाक प्रक्रिया को तत्काल स्थगित करने का अनुरोध किया गया है।
चूंकि मामला माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, कॉफ्फेड को न्यायपालिका पर पूर्ण विश्वास है। संगठन की मांग है कि न्यायिक एवं विभागीय समीक्षा पूरी होने तक इन सात जलाशयों की खुली डाक अथवा अंतिम बंदोबस्ती की कार्रवाई स्थगित रखी जाए।

कॉफ्फेड की प्रमुख मांगें-
1.नवादा जिले के सात जलाशयों की खुली डाक प्रक्रिया तत्काल स्थगित की जाए।
2. जलाशयों का बंदोबस्त बिहार मत्स्य जलकर प्रबंधन अधिनियम, 2006 और उसके संशोधनों के अनुरूप किया जाए।
3. संबंधित प्रखंडों की पात्र मत्स्यजीवी सहयोग समितियों को पहला सार्थक अवसर दिया जाए।
4. जलाशय मात्स्यिकी नीति, 2022 की 2006 के अधिनियम तथा 2007, 2010 और 2018 के संशोधनों के साथ वैधानिक संगतता की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
5. नई बंदोबस्ती नीति लागू करने से पहले मत्स्यजीवी सहयोग समितियों, राज्यस्तरीय संघों, मत्स्य विशेषज्ञों और प्रभावित मछुआरा समुदायों से परामर्श किया जाए।
6. राजस्व प्राप्ति के नाम पर पारंपरिक मछुआरों की आजीविका निजी ठेकेदारों को हस्तांतरित नहीं की जाए।
कॉफ्फेड ने कहा कि बिहार के जल संसाधनों पर पहला आजीविका अधिकार उन पारंपरिक मछुआरों का है, जो पीढ़ियों से मत्स्य पालन, जल संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। सरकार की नीतियों का उद्देश्य इन समुदायों को सशक्त करना होना चाहिए, न कि उन्हें जलाशयों से विस्थापित करना।
नवादा जिले में जलाशयों की बंदोबस्ती हेतु अपनाई जा रही असंवैधानिक खुली डाक प्रक्रिया का पर्दाफाश करना और राज्य के 16 लाख पारंपरिक मछुआरों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु आगामी संघर्ष की रूपरेखा प्रस्तुत करना है।
कॉफेड के अध्यक्ष प्रयाग सहनी ने कहा कि नवादा जलाशय बंदोबस्ती सूचना का कड़ा विरोध कॉफेड, जिला मत्स्य पदाधिकारी-सह-मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, नवादा द्वारा जारी ज्ञापांक 969/मत्स्य/नवादा दिनांक 01.09.2026 का पुरजोर विरोध और बहिष्कार करता है। इस सूचना के माध्यम से नवादा जिले के 7 प्रमुख जलाशयों कौआकोल अंचल स्थित झंगराही एवं शिवपुर जलाशय, गोविन्दपुर अंचल स्थित पिपरा जलाशय, रजौली अंचल स्थित भड़रा एवं डिबौर जलाशय तथा सिरदला अंचल स्थित शैलगढ़ एवं बहुआरा जलाशय की बंदोबस्ती वर्ष 2026-2031 की अवधि के लिए ष्खुली डाकष् द्वारा करने का निर्णय लिया गया है, जो पूर्णतः विधि-विरुद्ध है।
माननीय उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक आदेश की अवमानना: माननीय पटना उच्च न्यायालय ने सीडब्ल्युजेसी 5584/2005 (ऋषिकेश कश्यप बनाम बिहार राज्य) दिनांक 17.05.2005 में स्पष्ट निर्देश दिया था कि “सर्कुलर राज” समाप्त कर विधि सम्मत शासन स्थापित किया जाए। इसी आदेश और राज्य सरकार द्वारा न्यायालय को दिए गए अंडरटेकिंग के परिणामस्वरूप 2006 का अधिनियम पारित हुआ था। वर्तमान अधिसूचना उस न्यायिक भावना के विपरीत है।
नीतिगत विरोधाभास का सिद्धांत: बिहार राज्य जलाशय मात्स्यिकी नीति-2022 की कंडिका 6(ii) और कार्यान्वयन अनुदेश 183 (दिनांक 25.01.2023) बिहार जलकर प्रबंधन अधिनियम, 2006 के मूल प्रावधानों के सर्वथा विपरीत हैं। विधिक सिद्धांत के अनुसार, विधायी अधिनियम के ऊपर प्रशासनिक आदेश या नीति शून्य है।
पारंपरिक मछुआरों पर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव खुली डाक की ऊँची बोली के कारण गरीब और भूमिहीन पारंपरिक मछुआरे बंदोबस्ती प्राप्त करने में विफल हो जाते हैं। यह प्रक्रिया स्थानीय समितियों को विस्थापित कर बाहर के दबंग लोगों और पूंजीपतियों को जलाशय सौंपने की एक सुनियोजित साजिश है। इंद्रपुरी जलाशय इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ खुली डाक की नीति के कारण 10 प्रखंडों के पारंपरिक मछुआरे बेरोजगार हो गए और भुखमरी की कगार पर पहुँच गए। नवादा में भी 16 लाख मछुआरों के भविष्य पर ऐसा ही संकट मंडरा रहा है।
कॉफेड के निदेशक सिमरन, मदन सहनी, सुनिल सहनी एवं नीरज कुमार ने आंदोलन की चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार नवादा की इस अवैध डाक प्रक्रिया को तुरंत स्थगित नहीं करती है, तो कॉफेड पूरे राज्य में जल सत्याग्रह और उग्र आंदोलन की शुरुआत करेगा। हम चुपचाप अपने 16 लाख मछुआरा भाई-बहनों की जीविका को पूँजीपतियों के हाथों नीलाम होते नहीं देख सकते।
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