पटना 25 फरवरी 2026

जद (यू) प्रदेश प्रवक्ता अंजुम आरा ने मीडिया में जारी बयान में विपक्षी पार्टियों पर तंज कसते हुए कहा कि जब अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का बजट सदन के पटल पर प्रस्तुत किया गया, तब यह अपेक्षा थी कि जो दल स्वयं को अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं, वे शिक्षा, रोजगार, छात्रवृत्ति और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस करेंगे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से न कोई प्रश्न उठाया गया, न कोई सुझाव दिया गया और न ही किसी प्रकार की सार्थक चर्चा की गई।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को 896 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 26 करोड़ रुपये अधिक है। यदि वर्ष 2005 के 3.53 करोड़ रुपये के शुरुआती बजट से तुलना की जाए तो आज यह राशि बढ़कर 1,041 करोड़ रुपये (2025-26) तक पहुंच चुकी है, जो 300 गुना से अधिक वृद्धि को दर्शाती है। यह वृद्धि केवल आंकड़ों का विस्तार नहीं, बल्कि नीति-स्तर पर प्राथमिकता और प्रतिबद्धता का संकेत है।

सरकार ने 534 प्रखंडों में ब्लाॅक अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों की नियुक्ति का लक्ष्य निर्धारित किया है और 1,076 नए पद सृजित किए हैं, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन और अधिक प्रभावी हो सके। मदरसों में स्मार्ट क्लास की व्यवस्था, अल्पसंख्यक आवासीय विद्यालयों का विस्तार, तलाकशुदा महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता तथा 9,000 से अधिक कब्रिस्तानों की घेराबंदी जैसी पहलें इस दिशा में ठोस कदम मानी जा सकती हैं। ये प्रयास दर्शाते हैं कि योजनाएं केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने की मंशा भी स्पष्ट है।

इसके विपरीत, जब सदन में इन विषयों पर चर्चा का अवसर था, तब विपक्ष की चुप्पी यह प्रश्न खड़ा करती है कि क्या अल्पसंख्यक कल्याण केवल चुनावी भाषणों का मुद्दा बनकर रह गया है। यदि किसी वर्ग के हितों की बात सचमुच प्राथमिकता में हो, तो उसका सबसे सशक्त मंच सदन ही होता है, जहां नीति और बजट पर प्रभाव डाला जा सकता है। लोकतंत्र में जिम्मेदारी केवल आरोप लगाने से पूरी नहीं होती, बल्कि बहस, सुझाव और सहभागिता से निभाई जाती है।

विकास की राजनीति और वोट बैंक की राजनीति के बीच का अंतर काम और व्यवहार से स्पष्ट होता है। जनता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं होतीय वह आंकड़ों, नीतियों और जमीनी परिणामों के आधार पर आकलन करती है। ऐसे में सदन की चुप्पी और मंच की बयानबाज़ी के बीच का विरोधाभास स्वयं एक बड़ा राजनीतिक संदेश बनकर उभरता है।

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