पटना, 22 अगस्त 2026
बिहार विद्यापीठ, कुर्जी, पटना में भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा और जीवनोपयोगी शिक्षा के समन्वय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में ‘श्रावणोत्सव : रुद्राभिषेक अनुष्ठान’ का आयोजन श्रद्धा एवं उल्लास के वातावरण में किया गया।

वैदिक एवं पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न इस अनुष्ठान का संचालन पं. शम्भु झा के निर्देशन में हुआ। बिहार विद्यापीठ परिवार के पदाधिकारियों, शिक्षकों, प्रशिक्षुओं एवं श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भगवान शिव का रुद्राभिषेक कर लोककल्याण, शांति एवं समृद्धि की प्रार्थना की।

रुद्राभिषेक को बनाया गया ‘भारतीय ज्ञान परम्परा’ के अध्ययन का आधार
कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बिहार विद्यापीठ के अध्यक्ष विजय प्रकाश, भा.प्र.से. (सेवानिवृत्त) द्वारा रचित पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और समग्र अधिगम’ का लोकार्पण रहा। पुस्तक में रुद्राभिषेक को एक प्रकरण-अध्ययन के रूप में लेते हुए भारतीय परंपराओं में निहित ज्ञान, कौशल, तकनीकी समझ, संस्कार, मूल्यबोध तथा समग्र अधिगम की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है।
पुस्तक का मूल प्रतिपाद्य यह है कि भारतीय यज्ञ, व्रत, पूजा एवं अनुष्ठान केवल धार्मिक आस्था और कर्मकांड तक सीमित नहीं रहे हैं। इनके माध्यम से समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी व्यावहारिक ज्ञान, अनुशासन, सामुदायिक सहभागिता, पर्यावरण-संवेदनशीलता, पारंपरिक स्वास्थ्य-बोध, हस्तकौशल, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का संचार भी होता रहा है। परम्परा से शिक्षा और शिक्षा से समग्र विकास की ओर पुस्तक में श्रावण मास, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक जैसी जीवंत परंपराओं के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि भारतीय समाज में ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह जीवन-पद्धति, व्यवहार, उत्सव, अनुष्ठान और सामुदायिक गतिविधियों में भी अभिव्यक्त होता रहा है।
इस दृष्टि से पुस्तक को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक माना जा सकता है। इसमें भारतीय परंपरागत ज्ञान को आधुनिक शिक्षा, कौशल-विकास, मूल्य-शिक्षा और जीवनोपयोगी अधिगम से जोड़ने की संभावनाओं को रेखांकित किया गया है।

भारतीय परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता
पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर विजय प्रकाश ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की गौरवगाथा के रूप में देखने के बजाय उसके शैक्षिक, वैज्ञानिक, सामाजिक, कौशलगत और मूल्यपरक पक्षों को समझने की आवश्यकता है। रुद्राभिषेक जैसी परंपराओं में आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ अनुशासन, संगठन, सामूहिकता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, संसाधनों के उपयोग और पारंपरिक कौशल का भी समावेश दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि यदि इन परंपराओं के अंतर्निहित ज्ञान और जीवन-मूल्यों को आधुनिक शैक्षिक पद्धतियों से जोड़ा जाए, तो शिक्षा को अधिक समग्र, अनुभवात्मक, जीवनोपयोगी और समाज-सापेक्ष बनाया जा सकता है।

बिहार विद्यापीठ परिवार की सक्रिय सहभागिता
कार्यक्रम में बिहार विद्यापीठ के सचिव डॉ. राणा अवधेश, वित्त सचिव डॉ. नीरज सिन्हा, संयुक्त सचिव अवधेश के नारायण, निदेशक (शिक्षा, संस्कृति एवं संग्रहालय) डॉ. मृदुला प्रकाश, सदस्य विवेक रंजन, सीईओ एआईसी बिहार विद्यापीठ फाउंडेशन प्रमोद कुमार कर्ण, प्राचार्य डॉ. पूनम वर्मा, डॉ. प्रतिमा कुमारी, डॉ. रीना चौधरी, कंचन कुमारी, मिताली मित्रा, पूर्व विधि पदाधिकारी शिल्पी कंठ सहित अन्य पदाधिकारी, शिक्षक, प्रशिक्षु एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे तथा सामूहिक पूजन-अर्चना में सहभागिता की।
अनुष्ठान को सफल बनाने में अजय चौधरी, गुफरान अहमद, राकेश रमण, स्वीटी कुमारी, राकेश सिन्हा, दिनेश कुमार, विनिता कुमारी, ज्योति कुमारी, संटू, श्याम सहित महाविद्यालय के सभी प्रशिक्षुओं ने समर्पण एवं सहयोग की भावना से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्रावणोत्सव का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा और शिक्षा के अंतर्संबंध को समझने का एक सार्थक अवसर बना। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित अनुभव, कौशल, संस्कार और मूल्य आधुनिक शिक्षा को अधिक मानवीय, समग्र एवं जीवन-सापेक्ष बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
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