पटना 24 अगस्त 2026

प्रख्यात महिला रंगकर्मी नूर फातिमा जयंती के 24वीं वर्षगाँठ का आयोजन प्रेमचंद रंगशाला, सैदपुर, राजेन्द्र नगर, पटना में मनाया गया। इस वर्ष प्रयास रंगमंडल मिथिलेश सिंह लिखित एवं निर्देशित नाटक “शहंशाह-ए-शहनाई” की प्रस्तुति की।
नूर फातिमा जयंती समारोह की नींव रखने वाले अमलेन्दू नारायण सिन्हा का इसी वर्ष 6 जनवरी 2026 को देवहसान हो गया। ऐसे में इस समारोह को नई सोंच और नया नाम दिया गया है। अब इस समारोह का नवीन नाम नूर फातिमा जयंती सह नूर-अमलेन्दू सम्मान समारोह हो गया है। रंगकर्म के क्षेत्र से महिला रंगकर्मी को दिये जानेवाले सम्मान एथावत रहा। इस वर्ष यह सम्मान ज्योति परिहार, निदेशक, किलकारी, बिहार बाल भवन को दिया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र से अब यह सम्मान अमलेन्दू नारायण सिन्हा के नाम से दिया गया। इस वर्ष से प्रारंभ यह पहला सम्मान संतोष कुमार मनमोहन, संवाददाता, दैनिक हिन्दुस्तान, मखदुमपुर, जहानाबाद को संस्था के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो० श्याम शर्मा के हाथों दिया गया। नूर फातिमा जयंती समारोह प्रयास एवं एकता मंच द्वारा आयोजित किया जाता है एवं इस आयोजन में बिहार आर्ट थिएटर की सहभागिता रहती है।
नाट्य मंचन पूर्व संस्था के अध्यक्ष प‌द्मश्री प्रो० श्याम शर्मा, उपाध्यक्ष बाँके बिहारी साव, महासचिव मिथिलेश सिंह, अभीषक रंजन, महासचिव ‘बिहार आर्ट थिएटर’, शैलजा सिन्हा ‘एकता मंच’, आई.पी.एस. आलोक राज, राज कुमार नहर एवं अन्य गणमान्य अतिथीयों द्वारा दीप प्रज्जवलित कर मंच का उद्घाटन किया गया।

नाटक “शहंशाह-ए-शहनाई” के बारे में
बिहार के डुमराँव में जन्में कमरूद्दीन ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ हो गये। 21 मार्च 1916 को जन्में कमरूद्दीन 6 वर्ष की अवस्था में अपने मामा के शागिर्दगी में बनारस में शहनाई सिखते रहे। उनका पूरा खानदान शहनाई बजाता था। उनके मामाजान विश्वनाथ मंदिर, बनारस, नाना ग्वालियर घराने तो उनके अब्बा हुजूर पैगंबर बख्श खान डुमराँव दरबार मे शहनाई बजाते थे। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने जब शहनाई की साधना शुरू किया तो इस साज में पहली दफा शास्त्रीय संगीत का रस भर दिया। जिस से यह शहनाई साज बड़े-बड़े जलसों में बजने लगा। रेडियो पर पहली दफा शहनाई बिस्मिल्लाह खान ने ही बजाया है। आज भी रेडियो पर शहनाई से मंगल ध्वनी उन्हीं का बजता है। अनगिनत देशों में अपनी शहनाई से लोगों को मुरीद करने वाले विदेश में नहीं बनारस में ही रहना पसंद किया। उनका कहना था सारा रस बनारस में ही है। इसी लिए इसका नाम बनारस पड़ा।

16 वर्षों की आयु में मुग्गन खानम से इनका निकाह हुआ था। उनके नौ औलाद है। शहनाई को वह दुसरी बेगम मानते थे। कहते है भरा-पुरा परिवार और शर्गीदो को मिलाकर लगभग दो सौ लोगों की परवरिश उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ही करते थे। बनारस से उन्हें इतना लगाव था कि वह अमेरिका बसने के प्रस्ताव को ठुकरा दिये थे। उनकी जिंदगी में सोमा घोष एक दत्तक बेटी के रूप में आई। सोमा घोष भी मशहूर ठुमरी गायिका है। 21 अगस्त 2006 को बिस्मिल्लाह खाँ की 90 वर्ष की उम्र में खुदा के प्यारे हो गये।
नाटक शहंशाह-ए-शहनाई में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के जीवन के कई घटनायों को मंच पर जीवंत करने का प्रयास किया गया है, जिससे आम जन अंजान है।
उनकी पुरी कहानी को किस्सागोई शैली में बिस्मिल्लाह खाँ एण्ड पाट्री चलाने वाला काल्पनीक नाम जुम्मन और फकरू सुनाते है।

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