गाँधी जयंती पर विशेष आलेख
भारत के निर्माण में उर्दू की भूमिका
लेखक: विजय प्रकाश (सेवा निवृत आई ए एस)
प्रस्तावना
पटना ,01 अक्टूबर 2026
साथियों, एक छोटे से सवाल से शुरू करता हूँ। अगर आज सुबह से आपने ‘ज़रूर’, ‘शुक्रिया’, ‘वक़्त’, ‘दुकान’ या ‘अख़बार’ में से एक भी शब्द बोला है — तो बधाई हो, आप आज उर्दू बोल चुके हैं। और आपको इसके लिए भारत से बाहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
जब हम उर्दू की बात करते हैं, तो अक्सर कुछ लोगों के मन में एक ऐसी भाषा की तस्वीर उभरती है जो बाहर से आई हो। आज मैं इसी तस्वीर को सही करना चाहता हूँ। उर्दू भारत में आई नहीं, भारत में पैदा हुई है। इसका जन्म दिल्ली के बाज़ारों में, सिपाहियों की छावनियों में, दक्कन के दरबारों में और हमारे सूफ़ी संतों की ख़ानक़ाहों में हुआ। इसे उसी ‘खड़ी बोली’ ने पाला-पोसा, जिसने आधुनिक हिंदी को जन्म दिया।
दुनिया का कोई दूसरा देश उर्दू को अपनी जन्मभूमि की भाषा नहीं कह सकता। इसकी माँ हिंदुस्तान है। उर्दू की कहानी असल में भारत के बनने की कहानी है — मिलने, बाँटने और साथ रहने की कहानी। आइए, इस सफ़र पर चलते हैं — अमीर ख़ुसरो से संविधान सभा तक, ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ के नारों से उन गीतों तक, जो आज भी हमारे दिलों में बसते हैं।

सदाक़त आश्रम: जिस धरती पर हम आज खड़े हैं
इससे पहले कि हम उर्दू के सफ़र पर निकलें, एक पल उस जगह को सलाम करें जहाँ आज हम इकट्ठा हुए हैं। हिंदी और उर्दू की दोस्ती की बात करने के लिए सदाक़त आश्रम से बेहतर जगह पूरे हिंदुस्तान में शायद ही कोई हो — क्योंकि इस जगह का नाम ही उस दोस्ती का जीता-जागता सबूत है।

नाम में छुपी कहानी। ‘सदाक़त’ अरबी मूल का शब्द है, जो फ़ारसी के रास्ते उर्दू में आया; इसका अर्थ है — सच्चाई, सत्यनिष्ठा। ‘आश्रम’ संस्कृत का शब्द है, यानी साधना और सेवा का ठिकाना। दोनों को जोड़ दें तो बनता है — ‘सत्य का आश्रम‘। एक शब्द अरबी-फ़ारसी परंपरा से, एक संस्कृत परंपरा से, और दोनों मिलकर एक ही अर्थ कहते हैं। यही तो हिंदुस्तानी है! और ध्यान दीजिए — ‘सदाक़त’ यानी ‘सत्य’, वही शब्द जिसे गांधी जी ने अपने पूरे आंदोलन की नींव बनाया: सत्याग्रह।

जन्म की कहानी (1920–21)। यह असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन का दौर था — वह दौर जब हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़े थे। 11 दिसंबर 1920 को बिहार इंजीनियरिंग स्कूल के 110 छात्र अंग्रेज़ी शिक्षा का बहिष्कार कर जब मौलाना मज़हरुल हक़ के पास पहुँचे, तो उन्हें पढ़ाने और ठहराने के लिए गंगा किनारे, पटना–दानापुर रोड पर एक बाग़ में यह आश्रम बसाया गया। इसकी ज़मीन मज़हरुल हक़ के मित्र ख़ैरू मियाँ ने आज़ादी की लड़ाई को दान की थी।
हिंदू–मुस्लिम एकता का घर। मौलाना मज़हरुल हक़ ने इस आश्रम की स्थापना हिंदू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रीय शिक्षा के मक़सद से की थी। 6 फ़रवरी 1921 को यहीं बिहार विद्यापीठ का उद्घाटन हुआ — और उद्घाटन करने आए महात्मा गांधी, कस्तूरबा गांधी और मौलाना मोहम्मद अली जौहर, एक साथ। मज़हरुल हक़ इसके कुलाधिपति बने और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे साथी इसके संचालन से जुड़े। गांधी जी ने माना था कि मज़हरुल हक़ के प्रयासों के बिना पटना में राष्ट्रीय कॉलेज खोलना असंभव होता। यहीं से मज़हरुल हक़ ने अंग्रेज़ी साप्ताहिक ‘द मदरलैंड’ निकाला।
आज़ादी की लड़ाई का केंद्र। असहयोग आंदोलन (1920–22) तो यहीं से पला ही, आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भी सदाक़त आश्रम बिहार में आज़ादी की लड़ाई का धड़कता दिल बना रहा। स्वतंत्रता सेनानियों की अहम बैठकें यहीं होती थीं, और यहीं से बिहार भर के सत्याग्रहियों को दिशा मिलती थी।
आगे की विरासत। आज़ादी के बाद राष्ट्रपति पद से निवृत्त होकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसी आश्रम में आकर रहे और 28 फ़रवरी 1963 को यहीं उन्होंने अंतिम साँस ली। उनकी स्मृति में यहाँ राजेंद्र स्मृति संग्रहालय है।
“जिस आश्रम का नाम ही अरबी और संस्कृत के मेल से बना हो, जिसकी ज़मीन ख़ैरू मियाँ ने दी, जिसे मज़हरुल हक़ ने बसाया, और जहाँ राजेंद्र बाबू ने अंतिम साँस ली — उससे बड़ा ‘दो आँखों‘ का सबूत और क्या होगा?”

उर्दू का जन्म और विकास
उर्दू को एक मुकम्मल ज़बान बनने में लगभग छह सौ साल लगे, और यह पूरा सफ़र इसी भारत भूमि पर तय हुआ। 12वीं सदी के बाद दरबार की आधिकारिक भाषा फ़ारसी थी, लेकिन दिल्ली और दोआब के लोग खड़ी बोली बोलते थे। सिपाही, व्यापारी, सूफ़ी और आम अवाम इन दोनों को मिलाने लगे। इस नई बोली के कई नाम पड़े: हिंदवी, हिंदी, देहलवी, रेख़्ता (यानी “मिली-जुली”) और दक्षिण में दक्खिनी।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर ख़ुसरो (1253–1325) ने इसी ‘हिंदवी’ में पहेलियाँ और कविताएँ लिखीं। वे गर्व से ख़ुद को ‘तुर्क-ए-हिंदुस्तानी’ कहते थे। दक्कन में बहमनी, बीजापुर और गोलकुंडा के दरबारों में दक्खिनी में शायरी हुई। हैदराबाद के संस्थापक सुल्तान मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह को इस भाषा का पहला ‘साहिब-ए-दीवान’ (पूरा काव्य-संग्रह रचने वाला) शायर माना जाता है।
सन 1700 के आसपास जब वली दक्खिनी अपनी शायरी लेकर दिल्ली आए, तो दिल्ली के शायर हैरान रह गए कि आम लोगों की ज़बान में इतनी ख़ूबसूरती और रवानी हो सकती है। फिर आया सुनहरा दौर: दिल्ली में मीर तक़ी मीर, सौदा, ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन, और लखनऊ में नासिख़, आतिश, अनीस और दबीर जैसे दिग्गजों ने इसे परवान चढ़ाया।
‘उर्दू’ शब्द तुर्की के ‘ओर्दू’ से बना है, जिसका अर्थ है छावनी या लश्कर। दिल्ली को ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ (ऊँचा शहर) कहा जाता था, और उसकी भाषा को ‘ज़बान-ए-उर्दू-ए-मुअल्ला’। 18वीं सदी के आख़िर में जाकर इसे सिर्फ़ ‘उर्दू’ कहा जाने लगा। अपने ज़्यादातर शुरुआती जीवन में यह भाषा गर्व से ‘हिंदी’ या ‘हिंदवी’ ही कहलाती रही — यानी हिंद की भाषा।
“उर्दू मुग़लों के तख़्त की भाषा नहीं, दिल्ली के बाज़ार की भाषा है।“

एक व्याकरण, दो लिबास
हिंदी और उर्दू का ढाँचा बिल्कुल एक है; बस उनके कपड़े अलग हैं। उर्दू का व्याकरण उसी खड़ी बोली का व्याकरण है जो हिंदी का है — यह पूरी तरह भारतीय है, फ़ारसी नहीं।
- वाक्य का क्रम दोनों में समान है: कर्ता, कर्म, क्रिया (मैं किताब पढ़ता हूँ)।
- सहायक क्रियाएँ एक ही हैं: होना, करना, जाना, आना, है, था, रहा।
- परसर्ग (Postpositions) भी एक हैं: का, की, के, ने, को, से, में, पर।
- सर्वनाम और गिनती: मैं, तुम, वह; एक, दो, तीन।
उर्दू ने इस बुनियादी ढाँचे पर फ़ारसी और अरबी शब्दों की एक सुंदर परत चढ़ाई, और हिंदी ने संस्कृत से शब्द लिए। याद रखिए, फ़ारसी ख़ुद संस्कृत की चचेरी बहन है — दोनों एक ही हिंद-ईरानी भाषा परिवार से आती हैं।
सुबह से शाम तक: तीन धाराओं का एक दिन
ज़रा अपने एक आम दिन पर नज़र डालिए। सुबह उठकर हम ग़ुसलख़ाने में साबुन से नहाते हैं, आईने में बाल सँवारते हैं, नाश्ते में दूध–रोटी खाते हैं और अख़बार में ताज़ा ख़बर पढ़ते हैं। फिर दफ़्तर पहुँचकर कुर्सी पर बैठते हैं, क़लम उठाकर काग़ज़ पर दस्तख़त करते हैं। दोपहर को बाज़ार की दुकान से सब्ज़ी की क़ीमत पूछते हैं। शाम को घर का दरवाज़ा खोलकर माँ के पास आराम से बैठते हैं, और रात को आसमान में चाँद देखते–देखते नींद में ख़्वाब बुनने लगते हैं।
इस एक छोटे से दिन में तीनों धाराएँ बिना किसी झगड़े के साथ बह रही हैं: (फ़ा = फ़ारसी, अ = अरबी, भा = भारतीय/संस्कृत-प्राकृत)
- सुबह: सुबह (अ), ग़ुसलख़ाना (अ + फ़ा), साबुन (अ), आईना (फ़ा), नाश्ता (फ़ा), ताज़ा (फ़ा), अख़बार (अ), ख़बर (अ), दूध (भा), रोटी (भा), नहाना (भा)
- दफ़्तर और कचहरी: दफ़्तर (फ़ा), कुर्सी (अ), क़लम (अ), काग़ज़ (फ़ा), दस्तख़त (फ़ा), तनख़्वाह (फ़ा), हिसाब (अ), अदालत (अ), क़ानून (अ), वकील (अ), गवाह (फ़ा), काम (भा), हाथ (भा)
- दोपहर और बाज़ार: बाज़ार (फ़ा), दुकान (अ), क़ीमत (अ), सब्ज़ी (फ़ा), मसाला (अ), अचार (फ़ा), दाल (भा), चावल (भा), पैसा (भा), मोल-भाव (भा)
- शाम और घर: शाम (फ़ा), दरवाज़ा (फ़ा), आराम (फ़ा), दोस्त (फ़ा), ख़ुश (फ़ा), घर (भा), खिड़की (भा), आँगन (भा), माँ (भा), बच्चे (भा)
- रात और मन: आसमान (फ़ा), ख़्वाब (फ़ा), दिल (फ़ा), ज़िंदगी (फ़ा), याद (फ़ा), इंतज़ार (अ), क़िस्मत (अ), रात (भा), चाँद (भा), नींद (भा), सपना (भा)
इन शब्दों को अलग-अलग ख़ानों में बाँटना केवल भाषाविदों का शौक़ है। आम आदमी के लिए ये सब एक ही ज़बान के शब्द हैं — उसकी अपनी ज़बान।
बिहार का एक किसान जब कहता है, “ज़मीन का मुक़दमा अदालत में है”, तो वह एक साथ हिंदी और उर्दू दोनों बोल रहा होता है — बिना कभी भारत से बाहर गए।
“अगर हिंदी से उर्दू के शब्द निकाल दें, तो आप ‘ज़िंदगी‘, ‘मोहब्बत‘ या ‘हवा‘ भी नहीं कह पाएँगे।“

आज़ादी की लड़ाई में उर्दू
जब भारत आज़ादी के लिए लड़ा, तो उर्दू ने उस लड़ाई को आवाज़, नारे और गीत दिए। 1822 में कलकत्ता से छपा ‘जाम-ए-जहाँ-नुमा’ पहले उर्दू अख़बारों में से एक था। 1857 की क्रांति में ‘देहली उर्दू अख़बार’ के मौलवी मोहम्मद बाक़र ने विद्रोह का साथ दिया, जिसके लिए अंग्रेज़ों ने उन्हें मौत की सज़ा दी। उन्हें भारत की आज़ादी के लिए शहीद होने वाले पहले पत्रकारों में गिना जाता है। मुंशी प्रेमचंद का पहला कहानी-संग्रह ‘सोज़-ए-वतन’ (1908) उर्दू में था, जिसे अंग्रेज़ों ने ज़ब्त करके जला दिया।
नारे जिन्होंने साम्राज्य हिला दिया:
- इंक़लाब ज़िंदाबाद: 1921 में शायर मौलाना हसरत मोहानी का दिया नारा, जिसे भगत सिंह और उनके साथियों ने अमर कर दिया।
- जय हिंद: नेताजी की आज़ाद हिंद फ़ौज की पहचान बना यह अभिवादन; इसका श्रेय हैदराबाद के आबिद हसन सफ़रानी को दिया जाता है।
- दिल्ली चलो: नेताजी का आह्वान — और आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाहियों की रोज़मर्रा की ज़बान हिंदुस्तानी ही थी।
आज़ादी के तराने:
- सारे जहाँ से अच्छा (1904): अल्लामा इक़बाल रचित; 1984 में राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष से भारत का हाल इसी पंक्ति में बताया था।
- सरफ़रोशी की तमन्ना (1921): बिस्मिल अज़ीमाबादी का कलाम, जो राम प्रसाद बिस्मिल और काकोरी के क्रांतिकारियों का तराना बन गया।
- ख़ाक–ए–हिंद: एक कश्मीरी पंडित, बृज नारायण चकबस्त की देशभक्ति भरी उर्दू शायरी।
- शुभ सुख चैन: आज़ाद हिंद फ़ौज का राष्ट्रगान — ‘जन गण मन’ का हिंदुस्तानी रूप।
अल्लामा इक़बाल ने वह पंक्ति लिखी जो हर भारतीय जानता है: “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा।“ ध्यान दीजिए — शायर यहाँ ख़ुद को ‘हिंदी’ कह रहा है। उर्दू में ‘हिंदी’ का मतलब है — भारतीय।
गांधी जी और हिंदुस्तानी: भाषा से एकता का सपना
गांधी जी के लिए भाषा का सवाल व्याकरण का नहीं, आम आदमी को आज़ादी की लड़ाई में शामिल करने और हिंदू–मुस्लिम एकता का सवाल था। उनका तर्क सीधा था: अंग्रेज़ी करोड़ों किसानों-मज़दूरों को राजकाज से दूर रखती है, और सिर्फ़ संस्कृतनिष्ठ हिंदी या सिर्फ़ फ़ारसीनिष्ठ उर्दू देश के किसी न किसी हिस्से को पराया कर देगी। इसलिए उन्होंने वह भाषा चुनी जो बाज़ार में, रेल के डिब्बे में और खेत में सचमुच बोली जाती है — हिंदुस्तानी, जिसे देवनागरी और उर्दू, दोनों लिपियों में लिखा जा सके।
- 1909 — हिंद स्वराज: गांधी जी ने लिखा कि भारत की सर्वमान्य भाषा हिंदी होनी चाहिए, जिसे फ़ारसी या नागरी, किसी भी लिपि में लिखने की छूट हो। यानी दो लिपियों का विचार आज़ादी से 38 साल पहले ही उनके मन में था।
- 1918 — इंदौर और दक्षिण भारत: उन्होंने इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की और दक्षिण भारत में हिंदी सिखाने का अभियान शुरू किया, जो आगे चलकर ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ बना। इस काम के लिए उन्होंने अपने बेटे देवदास गांधी को मद्रास भेजा।
- 1925 — कानपुर अधिवेशन: कांग्रेस ने तय किया कि उसका कामकाज, जहाँ तक संभव हो, हिंदुस्तानी में होगा।
- 1942 — हिंदुस्तानी प्रचार सभा: हिंदी और उर्दू को साथ बढ़ाने के लिए वर्धा में यह सभा बनी। गांधी जी ने मिसाल क़ायम करने के लिए ख़ुद उर्दू लिपि सीखी और लोगों से दोनों लिपियाँ सीखने की अपील की।
- 1945 — सिद्धांत के लिए इस्तीफ़ा: जब हिंदी साहित्य सम्मेलन ने केवल देवनागरी वाली हिंदी पर ज़ोर दिया, तो गांधी जी ने हिंदुस्तानी छोड़ने के बजाय सम्मेलन की सदस्यता से ही इस्तीफ़ा दे दिया।
उन्होंने अपनी दुविधा एक वाक्य में कही थी: “मैं दो घोड़ों पर कैसे सवार हो सकता हूँ? कौन समझेगा जब मैं कहूँ कि राष्ट्रभाषा = हिंदी, और राष्ट्रभाषा = हिंदी + उर्दू = हिंदुस्तानी?”
इसका असर क्या हुआ? 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या हो गई। जब 1949 में संविधान सभा ने भाषा का फ़ैसला किया, तब उनकी आवाज़ सदन में नहीं थी, और ‘हिंदुस्तानी’ की जगह ‘हिंदी’ चुनी गई। फिर भी उनका विचार पूरी तरह हारा नहीं — संविधान के अनुच्छेद 351 में ‘हिंदुस्तानी’ शब्द आज भी दर्ज है, जो हिंदी को सबको साथ लेकर बढ़ने का रास्ता दिखाता है।
“राष्ट्रपिता ने उर्दू लिपि ख़ुद सीखी, ताकि कोई यह न कहे कि यह भाषा पराई है।“
संविधान सभा: हिंदी राजभाषा कैसे बनी
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को संघ की ‘राजभाषा‘ (Official Language) बनाया — ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं। हमारा संविधान किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं करता। यह फ़ैसला तीन साल की खींचतान, बँटवारे के ज़ख़्म और एक बड़े समझौते से निकला। इसे चार चरणों में समझिए।

पहला चरण — बहस की शुरुआत (1946–47): संविधान सभा के नियमों में सदस्यों को हिंदुस्तानी (हिंदी या उर्दू) या अंग्रेज़ी में बोलने की छूट थी। शुरुआत से ही कुछ सदस्य हिंदुस्तानी को तुरंत एकमात्र भाषा बनाने पर अड़ गए, जबकि दक्षिण और पूर्व के सदस्य अंग्रेज़ी छोड़ने को तैयार नहीं थे। बँटवारे से पहले तक कांग्रेस का आधिकारिक रुख़ गांधी जी वाला ही था — दो लिपियों वाली हिंदुस्तानी।
दूसरा चरण — बँटवारे ने माहौल बदल दिया (1947–48): बँटवारे के बाद हिंदुस्तानी और उर्दू लिपि को कई लोग ‘रियायत’ मानने लगे। पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास और आर.वी. धुलेकर जैसे नेताओं के नेतृत्व में एक मज़बूत समूह ने केवल देवनागरी वाली हिंदी की माँग की। दूसरी ओर, दक्षिण के सदस्यों को डर था कि हिंदी थोपी गई तो नौकरियों और अवसरों में वे पीछे छूट जाएँगे; टी.टी. कृष्णमाचारी ने ‘हिंदी साम्राज्यवाद’ के ख़तरे की खुली चेतावनी दी। इसी तनाव के कारण फ़रवरी 1948 के संविधान-प्रारूप में भाषा का प्रावधान छोड़ दिया गया और फ़ैसला आगे के लिए टाल दिया गया।
तीसरा चरण — पार्टी के भीतर संघर्ष (1949): असली लड़ाई कांग्रेस पार्टी की बंद बैठकों में लड़ी गई। लिपि और अंकों पर तीखी बहस हुई — देवनागरी अंक (१, २, ३) या अंतरराष्ट्रीय अंक (1, 2, 3)? बताया जाता है कि अंकों का सवाल सिर्फ़ एक वोट के अंतर से तय हुआ। इतना कम अंतर बताता था कि ज़बरदस्ती से फ़ैसला थोपा गया तो देश बँट सकता है।
चौथा चरण — 12 से 14 सितंबर 1949 की ऐतिहासिक बहस: के.एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी आयंगर ने बीच का रास्ता निकाला, जिसे ‘मुंशी–आयंगर फ़ॉर्मूला‘ कहा गया। तीन दिन तक सदन में सैकड़ों संशोधनों पर बहस हुई। क़ाज़ी सैयद करीमुद्दीन ने याद दिलाया कि 1947 में कांग्रेस दोनों लिपियों वाली हिंदुस्तानी पर सहमत थी; मोहम्मद इस्माइल ने यही प्रस्ताव रखा, और मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान ने हिंदुस्तानी की अपील की। सेठ गोविंद दास चाहते थे कि अंग्रेज़ी की अवधि और कम हो। 13 सितंबर को नेहरू ने सदन को चेताया कि विरोध करने वालों पर कोई भाषा ज़बरदस्ती नहीं थोपी जा सकती, और हिंदी को ‘सबको समेटने वाली’ भाषा बनाना होगा, ‘अलग करने वाली’ नहीं। 14 सितंबर को फ़ॉर्मूला भारी बहुमत से पारित हुआ। इसी दिन की याद में 1953 से हर साल ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाता है।
संविधान में क्या लिखा गया (भाग 17, अनुच्छेद 343–351):
- अनुच्छेद 343: संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी; सरकारी कामकाज के लिए अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप। अंग्रेज़ी 15 साल (1965 तक) जारी रहेगी, और संसद क़ानून बनाकर इसे आगे बढ़ा सकती है।
- अनुच्छेद 344: हिंदी की प्रगति की समीक्षा के लिए राजभाषा आयोग और संसदीय समिति।
- अनुच्छेद 345–347: हर राज्य अपनी राजभाषा ख़ुद चुनेगा; केंद्र–राज्य और राज्यों के आपसी पत्राचार के नियम।
- अनुच्छेद 348: सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और क़ानूनों की आधिकारिक भाषा अंग्रेज़ी, जब तक संसद कुछ और तय न करे।
- अनुच्छेद 351: हिंदी का ऐसा विकास हो कि वह “भारत की सामासिक संस्कृति” की अभिव्यक्ति बन सके, और हिंदुस्तानी व आठवीं अनुसूची की अन्य भाषाओं के रूप, शैली और शब्द अपनाकर समृद्ध हो।
- आठवीं अनुसूची: शुरुआत में 14 भारतीय भाषाएँ — और उर्दू उनमें शान से शामिल थी। आज इसमें 22 भाषाएँ हैं।
आगे का सफ़र (1950–1968): संविधान ने दरवाज़ा खोला, लेकिन रास्ता अगली दो दशकों में बना।
- 1955–56: बी.जी. खेर की अध्यक्षता में पहला राजभाषा आयोग बना।
- 1957–59: गोविंद बल्लभ पंत की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने आयोग की रिपोर्ट की समीक्षा की। इसी दौर में नेहरू ने संसद में भरोसा दिलाया कि जब तक ग़ैर-हिंदी भाषी लोग चाहेंगे, अंग्रेज़ी सहयोगी भाषा बनी रहेगी।
- 1960: राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का राजभाषा आदेश जारी हुआ, और हिंदी के विकास के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय बना।
- 1963: गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राजभाषा अधिनियम पारित कराया, जिससे 1965 के बाद भी अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रह सका।
- 1965: तमिलनाडु में आंदोलन; प्रधानमंत्री शास्त्री ने आकाशवाणी पर भरोसा दिलाकर शांति लौटाई।
- 1967–68: राजभाषा अधिनियम में संशोधन से यह तय हुआ कि जब तक सभी ग़ैर-हिंदी राज्य और संसद के दोनों सदन सहमत न हों, अंग्रेज़ी जारी रहेगी। 1968 के राजभाषा संकल्प में स्कूलों के लिए ‘त्रिभाषा सूत्र’ अपनाया गया।
इस पूरी कहानी का सबक: हिंदी को राजभाषा का दर्जा किसी एक दिन के वोट से नहीं, बल्कि बार-बार के समझौतों और भरोसे से मिला। जहाँ ज़बरदस्ती हुई, वहाँ आग भड़की; जहाँ भरोसा दिया गया, वहाँ हिंदी आगे बढ़ी। आज हिंदी फ़िल्मों, टीवी और बाज़ार के ज़रिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक समझी जाती है — और यह प्रेम से हुआ, आदेश से नहीं।
“हमारा संविधान ख़ुद हिंदी से कहता है — हिंदुस्तानी को गले लगाकर बढ़ो, उसे ठुकराकर नहीं।“

भाषा का पुल बनाने वाले दो नेता
डॉ. राजेंद्र प्रसाद — विद्वान राष्ट्रपति। बिहार के जिस घर में वे पले, वहाँ उनके पिता संस्कृत और फ़ारसी, दोनों के विद्वान थे। राजेंद्र बाबू ख़ुद हिंदी और अंग्रेज़ी के साथ फ़ारसी, उर्दू और संस्कृत के जानकार थे, और राष्ट्रवादी हिंदी पत्र ‘देश’ में लिखते थे। संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने तीन दिन की गरम बहस को संयम से समझौते तक पहुँचाया। 24 जनवरी 1950 को सदस्यों ने संविधान की अंग्रेज़ी और हिंदी, दोनों प्रतियों पर हस्ताक्षर किए, और राष्ट्रपति के रूप में 1960 का राजभाषा आदेश उन्हीं के नाम से जारी हुआ।
26 नवंबर 1949 के अपने समापन भाषण में उन्होंने कहा (भावार्थ): ग़ैर–हिंदी भाषियों ने अपनी इच्छा से हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया है — यह समायोजन की भावना और देश को एक राष्ट्र बनाने के संकल्प को दिखाता है। और उन्होंने हिंदी भाषियों को उनकी ज़िम्मेदारी याद दिलाई: हिंदी को ऐसा गढ़ें कि उसमें भारत की सामासिक संस्कृति की पूरी और गरिमापूर्ण अभिव्यक्ति हो सके।
लाल बहादुर शास्त्री — प्रचार हाँ, थोपना नहीं। काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि पाने वाले शास्त्री जी हिंदी के सच्चे प्रेमी थे; जेल में उन्होंने मैडम क्यूरी की जीवनी का हिंदी में अनुवाद किया था। लेकिन उनकी असली देन यह थी कि उन्होंने अपने भाषा-प्रेम से ऊपर देश की एकता को रखा।
- गृह मंत्री के रूप में (1963): 23 अप्रैल 1963 को उन्होंने संसद में राजभाषा विधेयक पेश किया। लोकसभा ने इसे 27 अप्रैल को पारित किया और 10 मई 1963 को यह क़ानून बना। इसके तहत 1965 के बाद भी हिंदी के साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रह सकता था। विपक्ष ने आपत्ति की कि क़ानून में ‘जारी रह सकती है’ लिखा है, ‘जारी रहेगी’ नहीं — यही शब्द आगे चलकर विवाद की जड़ बने।
- सबसे कठिन परीक्षा (जनवरी 1965): 26 जनवरी 1965 को संविधान की 15 साल की अवधि पूरी हो रही थी। तमिलनाडु में डर फैला कि अब हिंदी थोप दी जाएगी। 25 जनवरी से आंदोलन भड़का, हिंसा हुई और दर्जनों लोगों की जान गई। केंद्रीय मंत्री सी. सुब्रमण्यम और ओ.वी. अलगेसन ने विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया।
- 11 फ़रवरी 1965 का रेडियो संदेश: शास्त्री जी ने आकाशवाणी पर देश को भरोसा दिलाया कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी — केंद्र और राज्यों के बीच पत्राचार में अंग्रेज़ी जारी रहेगी, सिविल सेवा परीक्षाएँ अंग्रेज़ी में भी होती रहेंगी, और नेहरू जी के दिए आश्वासनों का पूरा सम्मान होगा।
- असर: दोनों मंत्रियों ने इस्तीफ़े वापस लिए, छात्रों ने आंदोलन रोका, और 14 मार्च 1965 को आंदोलन औपचारिक रूप से ख़त्म हुआ। इसी भरोसे की नींव पर 1967 का संशोधन बना, जिसने भाषा विवाद को स्थायी रूप से शांत किया।
“राजेंद्र बाबू ने हिंदी को संविधान में घर दिया, और शास्त्री जी ने सिखाया कि उस घर का दरवाज़ा न्योता देकर खोला जाता है, धक्का देकर नहीं।“
हमारे सिनेमा में उर्दू
हिंदी और उर्दू के एक होने का सबसे बड़ा प्रमाण हमारा सिनेमा है। 1931 की पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ से लेकर आज तक भारतीय सिनेमा हिंदुस्तानी ही बोलता है।
- मन तड़पत हरि दर्शन को आज (बैजू बावरा, 1952): शकील बदायूनी का लिखा, नौशाद का संगीतबद्ध और मोहम्मद रफ़ी का गाया कृष्ण भजन।
- अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम (हम दोनों, 1961): साहिर लुधियानवी की क़लम से निकली सर्वधर्म प्रार्थना।
- कर चले हम फ़िदा (हक़ीक़त, 1964): कैफ़ी आज़मी का लिखा, 1962 के युद्ध के सैनिकों की विदाई का अमर गीत।
- छैयाँ छैयाँ (दिल से, 1998): चलती ट्रेन पर गुलज़ार के रचे सूफ़ी बिंब।
साहिर, शकील, मजरूह, कैफ़ी, गुलज़ार, जावेद अख़्तर, शैलेंद्र, आनंद बख़्शी — हिंदू, मुस्लिम और सिख शायरों ने एक ही हिंदुस्तानी ज़बान में लिखा। सेंसर बोर्ड के सर्टिफ़िकेट पर ‘हिंदी फ़िल्म’ लिखा होता है, शायरी की रूह कहती है ‘यह उर्दू है’, और दर्शक तालियाँ बजाकर कहते हैं ‘वाह!’
एक राष्ट्र, अनेक लिपियाँ: क्या हो हमारा रास्ता?
लिपि को लेकर अक्सर यूरोप का उदाहरण दिया जाता है। तथ्य यह है कि यूरोपीय संघ की 24 आधिकारिक भाषाएँ तीन लिपियों में लिखी जाती हैं: 22 लैटिन में, ग्रीक अपनी यूनानी लिपि में, और बुल्गारियाई सिरिलिक में। यह एकरूपता किसी क़ानून से नहीं, बल्कि रोमन साम्राज्य और चर्च के 1,500 साल के इतिहास से आई। और जहाँ-जहाँ लिपियाँ ज़बरदस्ती बदली गईं (जैसे 1928 में तुर्की या सोवियत मध्य एशिया में), वहाँ आने वाली पीढ़ियाँ अपने ही पुराने साहित्य से कट गईं।
लिपि केवल अक्षर नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और स्मृति की वाहक होती है। सिखों के लिए गुरमुखी, तमिल भाषियों के लिए उनकी प्राचीन लिपि और उर्दू ग़ज़ल के लिए नस्तालीक़ लिपि सिर्फ़ लिखने का माध्यम नहीं, उनकी आत्मा है। उर्दू अपनी लिपि के बिना अपनी बहुत सारी ख़ूबसूरती खो देती है।
लेकिन भारत के पास एक ऐसा लाभ है जो यूरोप के पास नहीं। हमारी लगभग सभी लिपियाँ (देवनागरी, बांग्ला, गुरमुखी, गुजराती, ओड़िया, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम) एक ही प्राचीन ब्राह्मी लिपि से निकली हैं और एक ही वैज्ञानिक ध्वन्यात्मक क्रम (क, ख, ग, घ) पर चलती हैं। इसलिए हमारा रास्ता थोपने का नहीं, जोड़ने का होना चाहिए: सभी लिपियों को बचाए रखें, और तकनीक (लिप्यंतरण/Transliteration) व स्वैच्छिक संपर्क-लिपि के ज़रिए एक-दूसरे की भाषाएँ पढ़ना सीखें।
“यूरोप केवल अक्षर बाँटता है। भारत उससे कहीं गहरी चीज़ बाँटता है — वर्णमाला का वह क्रम जो हर प्रदेश में ‘क‘ से ‘ज्ञ‘ तक चलता है। आइए, अपनी लिपियों के बीच पुल बनाएँ, उन पर बुलडोज़र न चलाएँ।“

निष्कर्ष: एक संस्कृति की दो आँखें
आज भारत में लगभग 5 करोड़ लोग उर्दू को अपनी मातृभाषा बताते हैं (जनगणना 2011) — दुनिया के किसी भी दूसरे देश से ज़्यादा। उर्दू हमारी आठवीं अनुसूची का गौरव है, जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है, और उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना और दिल्ली जैसे राज्यों में दूसरी राजभाषा है।
दोस्तों, हिंदी और उर्दू भारतीय संस्कृति की दो आँखें हैं। दोनों एक ही दुनिया को, लगभग एक ही जगह से देखती हैं, और मिलकर हमारी दृष्टि को गहराई देती हैं। एक आँख बंद कर लीजिए, तो दुनिया दिखेगी ज़रूर, पर तस्वीर सपाट हो जाएगी। कबीर और ग़ालिब की साझी विरासत खो जाएगी, तुलसीदास और मीर का साथ छूट जाएगा, और मुंशी प्रेमचंद — जो दोनों के थे — आधे रह जाएँगे।
आज हम सदाक़त आश्रम में खड़े हैं — ‘सत्य का आश्रम’, जिसका आधा नाम अरबी है और आधा संस्कृत। गांधी जी ने यही सपना देखा था, संविधान ने अनुच्छेद 351 में इसी का रास्ता दिखाया, और शास्त्री जी ने इसी की रक्षा के लिए अपने भाषा-प्रेम से ऊपर देश की एकता को रखा। इसलिए आइए, अब यह न पूछें कि कोई शब्द हिंदू है या मुसलमान, संस्कृत से आया है या फ़ारसी से। बस एक सवाल पूछें: क्या यह भारतीय है? उर्दू का जवाब बिल्कुल साफ़ है — यह यहीं पैदा हुई, यहीं पली-बढ़ी, यहीं आज़ादी के लिए लड़ी, और आज भी यहीं के गीत गाती है।
इक़बाल के शब्दों में यही सच्चाई गूँजती है: “हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा!”
जय हिंद! शुक्रिया! धन्यवाद!
![]()
