नई दिल्ली 12 अगस्त 2026

कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन तथा प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में कहा कि भारत उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों, लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (एसएमआर), घरेलू विनिर्माण क्षमताओं, निजी क्षेत्र की भागीदारी और देश के प्रचुर थोरियम संसाधनों के दीर्घकालिक उपयोग पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने स्वदेशी परमाणु ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र को लगातार मजबूत कर रहा है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा रणनीति देश के तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम द्वारा निर्देशित है जिसका उद्देश्य दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपने विशाल थोरियम भंडार का सतत उपयोग करना है। केंद्रीय बजट 2025-26 में घोषित परमाणु ऊर्जा मिशन के माध्यम से इस रणनीति को और गति मिली है। जिसका लक्ष्य 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावॉट तक बढ़ाना है।

सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई है। इसमें 700 मेगावाट क्षमता वाले प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) जैसे बड़े स्वदेशी रिएक्टरों और उन्नत रिएक्टर डिजाइनों को प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना की स्थापना के लिए नवीन (ग्रीनफील्ड) स्थल पर स्थापित करना शामिल  तथा साथ ही   मौजूदा विकसित (ब्राउनफिल्ड) स्थल पर छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (एसएमआर) का विकास और स्थापित करना भी शामिल है। इन ब्राउनफील्ड साइटों में जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली संयंत्रों, ऊर्जा-गहन उद्योगों के लिए कैप्टिव संयंत्रों और दूरस्थ क्षेत्रों में ऑफ-ग्रिड अनुप्रयोगों को शामिल किया गया है।

परमाणु ऊर्जा मिशन के अंतर्गत एक प्रमुख उद्देश्य 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी लघु-क्षमता रिएक्टरों (एसएमआर) का विकास और संचालन करना है। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) की एक घटक इकाई, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी), बिजली उत्पादन के लिए 220 मेगावाट क्षमता वाले भारत लघु-मॉड्यूलर रिएक्टर (बीएसएमआर-200) और 55 मेगावाट क्षमता वाले एसएमआर-55 सहित स्वदेशी एसएमआर प्रौद्योगिकियों के डिजाइन और विकास का कार्य कर रहा है। बीएआरसी 5 मेगावाट प्रति सेकंड तक की क्षमता वाले उच्च तापमान गैस-शीतित(गैस कूल्ड)  रिएक्टर (एचटीजीसीआर) का भी विकास कर रहा है। इसे हाइड्रोजन उत्पादन के लिए उपयुक्त तापरासायनिक(थर्मोकेमिकल)  चक्र के साथ जोड़ा जा सकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण को आगे बढ़ाने में इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) के निरंतर कार्यों पर भी प्रकाश डाला। आईजीसीएआर सोडियम शीतित द्रुत प्रजनक रिएक्टर (सोडियम कूल्ड फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों) और संबंधित बंद ईंधन-चक्र सुविधाओं के लिए बहुविषयक वैज्ञानिक अनुसंधान और उन्नत इंजीनियरिंग विकास कर रहा है जो भारत की दीर्घकालिक परमाणु रणनीति का एक महत्वपूर्ण आधार हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने सरकार द्वारा व्यापक घरेलू परमाणु पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के प्रयासों पर जोर देते हुए कहा कि भारत के परिवर्तन के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास (शांति) अधिनियम, 2025 को परमाणु क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी दोनों संस्थाओं की व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाने के लिए अधिनियमित किया गया है।

परमाणु ऊर्जा विभाग नई एसएमआर प्रौद्योगिकियों के लिए ज्ञान साझाकरण और मार्गदर्शन के माध्यम से भारतीय उद्योग को प्रोत्साहित कर रहा है और साथ ही साथ घरेलू परमाणु विक्रेताओं को विकसित कर रहा है तथा निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास तंत्र को मजबूत कर रहा है। रिएक्टर प्रेशर वेसल्स और रिएक्टिविटी कंट्रोल ड्राइव मैकेनिज्म के लिए कम मिश्र धातु इस्पात फोर्जिंग जैसे महत्वपूर्ण घटकों का निर्माण घरेलू उद्योग के माध्यम से पहले ही किया जा चुका है जबकि अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों का विकास भी घरेलू उद्योग और स्टार्टअप्स के साथ शुरू किया गया है।

शांति अधिनियम के अंतर्गत किए गए सुधारों में परमाणु सुरक्षा, संरक्षा और सुरक्षा उपायों के कड़े मानकों को बनाए रखते हुए परमाणु विनिर्माण, इंजीनियरिंग सेवाओं, अनुसंधान एवं विकास तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं में निजी संस्थाओं की अधिक भागीदारी की परिकल्पना की गई है। यह अधिनियम परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्जा भी प्रदान करता है, जिससे सशक्त नियामक निरीक्षण के ढांचे को मजबूती मिलती है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने थोरियम के विषय पर कहा कि भारत अपने यूरेनियम संसाधनों के अधिकतम उपयोग और प्रचुर मात्रा में मौजूद थोरियम भंडार का क्रमिक रूप से दोहन करने के लिए बंद ईंधन चक्र पर आधारित त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम चला रहा है। थोरियम एक उपजाऊ पदार्थ होने के कारण ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने से पहले इसे परमाणु रिएक्टर में विखंडनीय यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना आवश्यक है।

पहले चरण में, प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग पीएचडब्ल्यू (फास्ट ब्रीडर रिएक्टर) में ईंधन के रूप में किया जाता है, जिसके बाद प्रयुक्त ईंधन के पुनर्संसाधन द्वारा प्लूटोनियम निकाला जाता है। दूसरे चरण में, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अतिरिक्त विखंडनीय पदार्थ उत्पन्न करने के लिए प्लूटोनियम का उपयोग करते हैं। तीसरे चरण में, फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों की पर्याप्त क्षमता स्थापित होने के बाद, थोरियम से उत्पन्न यूरेनियम-233 के माध्यम से थोरियम का बड़े पैमाने पर उपयोग करने की परिकल्पना की गई है।

भारत ने थोरियम के उपयोग की दिशा में निरंतर अनुसंधान एवं विकास कार्य किया है। थोरियम ऑक्साइड (थोरिया) पेलेट्स का उपयोग परिचालनरत पीएचडब्ल्यू के प्रारंभिक कोर में किया गया है जबकि थोरिया-आधारित ईंधनों को बीएआरसी अनुसंधान रिएक्टरों में विकिरणित किया गया है। विकिरणित थोरिया पेलेट्स को पुनर्संसाधित करके यूरेनियम-233 प्राप्त किया गया है, जिसे बाद में आईजीसीएआर, कल्पक्कम स्थित कामिनी रिएक्टर के लिए ईंधन के रूप में निर्मित किया गया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से उन्नत परमाणु ऊर्जा प्रणाली के निर्माण के लिए कई उपाय कर रही है। इनमें परमाणु ऊर्जा मिशन का कार्यान्वयन, स्वदेशी एसएमआर का विकास, घरेलू परमाणु विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करना, रिएक्टर डिजाइन, निर्माण, संरचना और परमाणु ईंधन चक्र में निरंतर क्षमता निर्माण, साथ ही चिकित्सा आइसोटोप के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए आइसोटोप उत्पादन रिएक्टर (आईपीआर) के माध्यम से स्वदेशी परमाणु चिकित्सा अवसंरचना का विस्तार शामिल है।

इसलिए, सरकार का दृष्टिकोण स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, परमाणु क्षमता का विस्तार, उद्योग की अधिक भागीदारी, उन्नत रिएक्टर अनुसंधान और परमाणु ईंधन चक्र में निरंतर निवेश को मिलाकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के व्यापक उद्देश्य को पूरा करता है।

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