पटना,10 अक्टूबर 2026

बिहार विशिष्ट विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026 के विरोध में शनिवार को राज्यभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से बड़ी संख्या में शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी पटना के जेडी वीमेंस कॉलेज में एकत्रित हुए। प्रदर्शनकारियों का उद्देश्य शांतिपूर्ण मार्च करते हुए लोकभवन पहुंचना और राज्यपाल को इस अधिनियम के विरोध में ज्ञापन सौंपना था। लेकिन पुलिस प्रशासन ने मार्च को जेडी वीमेंस कॉलेज परिसर में ही रोक दिया। इस दौरान शिक्षकों एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों के साथ हुए पुलिसिया व्यवहार को लेकर भारी आक्रोश देखा गया।

प्रदर्शनकारियों के अनुसार, मार्च की पूर्व सूचना स्थानीय थाना, मुख्यमंत्री कार्यालय एवं लोकभवन को दी जा चुकी थी। इसके बावजूद पुलिस प्रशासन ने कॉलेज के मुख्य द्वार बंद कर दिए और परिसर में एकत्रित शिक्षकों एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों को बाहर निकलने से रोक दिया। जब शिक्षकों और कर्मचारियों ने गेट खोलकर शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ने का प्रयास किया, तो पुलिस ने उनके साथ बलपूर्वक कार्रवाई की। इस दौरान महिला प्राध्यापकों के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें घसीटकर पुलिस वाहनों में बैठाया गया। इस घटना से शिक्षकों और कर्मचारियों में गहरा रोष व्याप्त हो गया।

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग समूहों में घेरकर एक-दूसरे से अलग कर दिया तथा कई शिक्षकों एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों को विभिन्न थानों में ले जाकर हिरासत में रखा। इतना ही नहीं, हिरासत में लिए गए अपने साथियों की जानकारी लेने और उनकी सहायता के लिए थानों में पहुंचे शिक्षकों एवं कर्मचारियों को भी हिरासत में ले लिया गया। लोकभवन की ओर जाने वाले मार्गों पर भारी बैरिकेडिंग कर प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया।

प्रदर्शनकारी शिक्षकों ने कहा कि बिहार विशिष्ट विश्वविद्यालय अधिनियम पारंपरिक महाविद्यालयों को उनके मूल विश्वविद्यालयों से अलग कर नए विश्वविद्यालयों के अधीन लाने तथा उनकी स्वायत्तता समाप्त करने की सुनियोजित साजिश है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों की वर्षों पुरानी शैक्षणिक और प्रशासनिक संरचना में इतना बड़ा परिवर्तन शिक्षकों, शिक्षकेतर कर्मचारियों, विद्यार्थियों एवं अन्य हितधारकों से बिना किसी सार्थक विचार-विमर्श के किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने इसे उच्च शिक्षा व्यवस्था के हितों के विरुद्ध बताते हुए ‘काला कानून’ करार दिया और इसे तत्काल वापस लेने की मांग की।

शिक्षकों ने सवाल उठाया कि आखिर यह कैसी व्यवस्था है, जहां समाज के उच्च शिक्षित वर्ग को अपनी बात शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से रखने से भी रोका जा रहा है? जब शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी केवल राज्यपाल को ज्ञापन सौंपने के लिए शांतिपूर्ण मार्च करना चाहते थे, तो उन्हें रोकने के लिए इतनी व्यापक पुलिस व्यवस्था, बैरिकेडिंग और बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या सरकार अब शिक्षकों की आवाज सुनने के बजाय उसे दबाने की नीति अपना रही है?
विशेष रूप से महिला प्राध्यापकों के साथ हुए दुर्व्यवहार पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि शिक्षकों को घसीटकर पुलिस वाहनों में बैठाना और थानों में हिरासत में रखना अत्यंत निंदनीय है। उन्होंने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताया। शिक्षकों ने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और उच्च शिक्षा के भविष्य जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार को संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए, न कि असहमति की आवाज को बलपूर्वक दबाने का।

प्रदर्शनकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि जब मार्च की पूर्व सूचना संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को दी जा चुकी थी और प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था, तो शिक्षकों एवं कर्मचारियों को कॉलेज परिसर में बंद कर उनके आवागमन को बाधित करना किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है? उन्होंने कहा कि यह घटना न केवल शिक्षकों और कर्मचारियों के सम्मान से जुड़ी है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और शांतिपूर्ण विरोध की स्वतंत्रता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

शिक्षकों एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों ने सरकार से बिहार विशिष्ट विश्वविद्यालय अधिनियम को वापस लेने, पारंपरिक महाविद्यालयों को उनके मूल विश्वविद्यालयों से अलग न करने, उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने तथा प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।

प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शिक्षकों एवं कर्मचारियों के अधिकारों तथा उच्च शिक्षा के भविष्य की रक्षा के लिए उनका संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुनना और संवाद के माध्यम से समाधान निकालना सरकार की जिम्मेदारी है।

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